राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में
जारी रहे अपना सफर इस गुलिस्तान मेंचंद नसीहते माँ की सुन लो घर से दूर जाने वाले
तुझे लगे न किसी की नज़र इस गुलिस्तान मेंबुजुर्गों की अकीदत में गर अपना सर झुकायेंगे
उंचा होगा अपना सर इस गुलिस्तान मेंइक अरमां मिरे दिल में तेरी आँखों से देखूं सपने
आ जी भरके मुझे प्यार कर इस गुलिस्तान मेंफूलों की रौनक हो मुहब्बत के आँगन में
कोना कोना महके घर इस गुलिस्तान में‘कल्पना’ तुम्हारी दुआओं का असर हो ऐसा
फ़रिश्ते आ जाये उतर इस गुलिस्तान में ||
Posted by: कल्पना भारती | अक्टूबर 25, 2009
राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में…
Posted in Ghazal | टैग: Bharti Ghazal, Hindi poem


राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में
जारी रहे अपना सफर इस गुलिस्तान में
बहुत खूबसूरत अल्फाज़ और अशआर
बेहतरीन
By: M Verma on अक्टूबर 25, 2009
at 8:13 पूर्वाह्न
फूलों की रौनक हो मुहब्बत के आँगन में
कोना कोना महके घर इस गुलिस्तान में
‘कल्पना’ तुम्हारी दुआओं का असर हो ऐसा
फ़रिश्ते आ जाये उतर इस गुलिस्तान में ||
बहुत सुंदर गज़ल बधाई, थोड़ा फ़ोंट का साईज बढाएं बहुत छोटे हैं पढने मे दिक्कत हो थी है। बधाई
By: lalit sharma on अक्टूबर 25, 2009
at 8:39 पूर्वाह्न
चंद नसीहते माँ की सुन लो घर से दूर जाने वाले
तुझे लगे न किसी की नज़र इस गुलिस्तान में
अच्छी लगी ये पंक्तिया !
By: Abhishek on नवम्बर 7, 2009
at 1:53 पूर्वाह्न