पास मैं उन के जाने लगी हूँ
नैनों में उनको छुपाने लगी हूँ
मन में उन का नाम बसा कर
सपने मिलन के सजाने लगी हूँ
इंतजार में अक्सर उन्ही के
ग़ज़ल मैं गुनगुनाने लगी हूँ
वक्त-बेवक्त ख्वाबो में खोकर
नींद अपनी उडाने लगी हूँ
नई ख़ुशी मिली है मुझको
चैन अपना गंवाने लगी हूँ
मुझको मोहब्बत हो गयी हैं
अकेले में मुस्कराने लगी हूँ


बहुत खूब!!! बेहद रोमांटिक कविता है!
By: manhanvillage on नवम्बर 9, 2009
at 12:57 पूर्वाह्न
मुझको मोहब्बत हो गयी हैं
अकेले में मुस्कराने लगी हूँ
very nice
By: प्रवीण on नवम्बर 9, 2009
at 5:01 पूर्वाह्न
बहुत सुन्दर शब्द और अत्यंत सुन्दर भाव…वाह…अद्भुत रचना रच डाली है आपने…बधाई..
By: mohan vashisth on दिसम्बर 12, 2009
at 12:58 पूर्वाह्न
Sunder Gazal…aise hi likhte rahe..
By: Keshvendra on जनवरी 22, 2010
at 2:30 पूर्वाह्न
sundar sa khuabb,bhadhaee
By: manjul bhatnagar on जून 9, 2010
at 9:42 पूर्वाह्न