Posted by: कल्पना भारती | नवम्बर 7, 2009

पास मैं उन के जाने लगी हूँ

पास मैं  उन के  जाने लगी हूँ
नैनों में उनको छुपाने लगी हूँ

मन में  उन का नाम बसा कर
सपने मिलन के सजाने लगी हूँ

इंतजार में अक्सर उन्ही के
ग़ज़ल मैं गुनगुनाने लगी हूँ

 

वक्त-बेवक्त ख्वाबो में खोकर
नींद अपनी  उडाने लगी हूँ

नई ख़ुशी मिली है मुझको
चैन अपना गंवाने लगी हूँ

मुझको मोहब्बत हो गयी हैं
अकेले में मुस्कराने लगी हूँ

Posted by: कल्पना भारती | अक्टूबर 25, 2009

राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में…

राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में
जारी रहे अपना सफर इस गुलिस्तान में

चंद नसीहते माँ की सुन लो घर से दूर जाने वाले
तुझे लगे न किसी की नज़र इस गुलिस्तान में

बुजुर्गों की अकीदत में गर अपना सर झुकायेंगे
उंचा होगा अपना सर इस गुलिस्तान में

इक अरमां मिरे दिल में तेरी आँखों से देखूं सपने
आ जी भरके मुझे प्यार कर इस गुलिस्तान में

फूलों की रौनक हो मुहब्बत के आँगन में
कोना कोना महके घर इस गुलिस्तान में

‘कल्पना’ तुम्हारी दुआओं का असर हो ऐसा
फ़रिश्ते आ जाये उतर इस गुलिस्तान में ||

Posted by: कल्पना भारती | अक्टूबर 15, 2009

नेह का दीपक मैं बारती

नेह का दीपक मैं बारती
प्रियतम तोहे पुकारती
आजा प्रिय…

दिवाली की शाम है छाई
पूजन पाठ मैं कर आई
आँगन चौखट मुंडेर पे,
फुलमालायें मैं संवारती
आजा प्रिय…

मेहंदी माहवर मैंने लगाये
रंगोली भी हैं सजाये,
काजल बिंदिया श्रींगार कर
रूप सुंदर अपना निखारती
आजा प्रिय…

आनंद उत्साह के साथ आना
प्यार भरा कोई सौगात लाना
कटोरी भर मिष्ठान लिए,
पल पल द्वार को निहारती
आजा प्रिय…

मेरे संग तुम पंख लगाओ
कोई तिलिस्मी लोक घुमाओ
अमर कथा की अप्सरा बन,
उतारूँ मैं तुम्हारी आरती
आजा प्रिय…

कुछ ऐसे तुम मनुहार करो
प्रेम की शीतल बौछार करो
तन मन कर दो झंकृत,
विरह वेदना अब बिसारती
आजा प्रिय…

नेह का दीपक मैं बारती
प्रियतम तोहे पुकारती ॥

~~~शुभ दीपावली~~~

Posted by: कल्पना भारती | अक्टूबर 12, 2009

तुमसे मांगती मैं अपनी जिंदगी

सुबह से लेकर शाम है
लवों पे तेरा ही नाम है

भरता है दिल तेरे लिए आंहें
कोमल मन में सिर्फ तेरी यादें

करती हूँ जब तब तेरा इंतजार
लजाती हूँ तुमसे मिलके हरबार

पर्वत सा उंचा हो अपना विश्वास
ना तोड़ना वादा तुमसे है आस

सेवा में तुम्हारे हाज़िर है ये दिल
प्यार हो तुम मेरा तुमही मंजिल

रब से मांगु मैं तुमको सदा
हो न जाना कभी हमसे जुदा

गम हो या ख़ुशी होटों पे खिले हंसी
यार तुमसे मांगती मैं अपनी जिंदगी ||

Posted by: कल्पना भारती | सितम्बर 30, 2009

अक्सर सोचा करती हूँ

अक्सर सोचा करती हूँ
क्यूँ दुनिया से डरती हूँ

मन यादों का राह है
इससे मैं गुजरती हूँ

झील तेरे अहसासों का
बनकर नाव उतरती हूँ

तू एक दर्पण जिसमे
मैं सजती संवरती हूँ

तेरे ख्वाबो में आकर
मैं हर रोज़ निखरती हूँ

क्या तेरे दिल पर कभी
बनकर चोट उभरती हूँ

तू एक समंदर जिसे
बूँद बूँद मैं भरती हूँ ||

Posted by: कल्पना भारती | सितम्बर 28, 2009

Hello world!

This is Kalpana of a soft hearted kind person who lives near you.

Happy blogging!


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